Thursday, November 04, 2021

Love and Solitude

 "Capacity to love. It may look paradoxical to you, but it's not. It is an existential truth: only those people who are capable of being alone are capable of love, of sharing, of going into the deepest core of another person--without possessing the other, without becoming dependent on the other, without reducing the other to a thing, and without becoming addicted to the other. They allow the other absolute freedom, because they know that if the other leaves, they will be as happy as they are now. Their happiness cannot be taken by the other, because it is not given by the other."


Osho

Monday, October 04, 2021

Aaj phir shuru hua jeevan- Raghvir Sahay

 


aaj

Ek din subah

सूर्य तो हर सुबह निकलता है 
उसके पहले कितने लम्बे रास्तों पर,
घुमावदार और अकेले,
चलना होता है। 

हर सुबह 
मेरे मन में एक प्रश्न होता है?
हृदय में फूल लिए 
सुगंध से भरे शब्दों के साथ  
ठिठकते, शरमाते क़दमों से
मंदिर तक जाऊँ और रामकृष्ण बनकर 
अनंत पूजा करूँ 
या 
अपने अस्तित्व से  बाहर 
आसमान के भी पार 
नभ गंगा के अंतिम छोर पे 
खड़ा रह कर अनंत की गहराइयों में 
तेरी परछाइयां ढूंढूं 
तेरे बिखरे स्वर्णिम स्वर्गों से 
गहरे पातालों तक 
कौतुहल का जंजाल सम्भालूं ?
या 
अपने कर्मों की मशीन के पुर्जों 
को नित नयी शक्ति देकर 
अपनी निष्काम चादर बुनता जाऊँ, 
चादर जो श्वेत अनंत तक बढ़े 
और मेरे दैविक अस्तित्व का पालना 
बन कर, हलके हलके झोंकों से 
वो सुन्दर निद्रा में गमन दे दे 
या 
ये उधार लिए वस्त्र यहीं उतार दूँ 
जिनसे अब तक 
संसार की परिभाषा मिली 
वो मेरी तो थी नहीं 
उधार के वस्त्रों में 
उधार के शब्दों से 
छिछले ग्रंथों के सीमाओं में 
सिमटने का प्रयास अब रोक दूँ 
और जो है जैसा है, उसे वैसा जानूं ,
नग्न, सत्य और नित्य जो है 
उससे, उसमे, उतर जाऊँ।

हर रोज़ सुबह हर रास्ते पर 
कुछ कदम चलता हूँ 
और लगता की शायद 
कुछ ठीक नहीं हैं 
और हर शाम फिर उसी 
नुक्कड़ पर पहुँच जाता हूँ 
जहाँ से राहें फटती हैं | 

एक दिन जब में सुबह उठूंगा 
नक्शा कुछ बदला सा होगा 
जिधर कदम बढ़ेंगे, रौशनी बढ़ती जाएगी 
मेरे होने और नहीं होने, के बीच के फासले मिटते जाएंगे 
ज़िन्दगी भर से बुनी चादर के टुकड़े सिल कर एक होते जाएंगे 
हृदय कक्षों में रखे सारे फूल फिर जीवंत हो कर महकने लगेंगे 
समस्त अंतरिक्ष को अपनी हथेली पर रख कर 
मंदिर की ओर कदम बढ़ाऊँगा
कुछ गाऊंगा 
कुछ रोऊँगा 
कुछ उस पल की 
गोद  में  यूँ  ही सो जाऊंगा |




 

Saturday, January 30, 2021

vaham

"मैं एहम था
यही वहम था"

zikr

"मैं जिसका ज़िक्र करता हूं, वो मेरी फिक्र करता है"..

Friday, December 11, 2020

Love and the lonely

"Capacity to love. It may look paradoxical to you, but it's not. It is an existential truth: only those people who are capable of being alone are capable of love, of sharing, of going into the deepest core of another person--without possessing the other, without becoming dependent on the other, without reducing the other to a thing, and without becoming addicted to the other. They allow the other absolute freedom, because they know that if the other leaves, they will be as happy as they are now. Their happiness cannot be taken by the other, because it is not given by the other."

Osho

Tuesday, November 24, 2020

बगावत

कुछ तो तिरे मौसम ही मुझे रास कम आये..
और कुछ मिरी मिट्टी में बग़ावत भी बहुत थी..
-परवीन शाकिर

Thursday, November 05, 2020

आग

तेरे खुशबू में बसे खत मैं जलाता कैसे
प्यार में डूबे हुए खत मैं जलाता कैसे
तेरे हाथों के लिखे खत मैं जलाता कैसे
तेरे खत मैं आज गंगा में बहा आया हूं
आग बहते हुए पानी में लगा आया हूं।

-राजेन्द्र नाथ रहबर #जन्मदिन

Thursday, January 02, 2020

रिश्तों का बाग़


एक फूल यहाँ खिलता है,
एक ख्वाब यहाँ पलता है,
जीवन के वन में धीरे धीरे
एक बाग़ नया बनता है। 

कितने आसमानों से हर शाम
परिंदे यहाँ उतर आते हैं,
कुछ अपने से हो कर, कुछ सहमे से,
इन्हीं शाखों पर चहचहाते हैं।

कुछ बतियाते, कुछ कहकहे लगाते हैं,
कुछ यूँ ही वहां दूर खड़े मुस्कुराते हैं,
और आहिस्ता आहिस्ता उनमें से कुछ
जीवन में उतरते जाते हैं।

रिश्ते कहाँ सिर्फ रिश्ते रहते हैं
हिमालय से रुके, तो कभी गंगा से बहते हैं।
रोज़ जिसे सजाया नहीं जाता,
वो एक जुड़ा हुआ इतिहास कहते हैं।

यूँ तो राहें कई निकलतीं हैं,
कुछ दूर तलक जाती,
कुछ काफिलों से संवरती,
तो कुछ अंधड़ों से निपटती हैं । 
कुछ नुक्कड़ पर सिमटती हैं
या गलियारों में मिल जाती हैं ।

बागों में फूलों की खुशबुएँ,
जब इन गलियारों से होकर ,
लम्बी राहों पर जाती हैं,
भेद नहीं करती हैं वो,
सब राहों को चुनती,
चूमती, झूमती गाती, और
जीवन के उल्लास से सराबोर
बिना शर्त, बिना शर्म,
वो सबको मिलाती, सुनती, बताती हैं।

इन्हीं राहों पे चलकर
इन्हीं गलियारों से मिलकर,
अपनों से मिलो और 
कुछ समय बिताओ,
कुछ पल के लिए रोको ये काफिला,
कुछ आनंद के गीत गाओ,

कुछ कहो अनजाना सा,
कुछ कही सुनी दोहराओ,
जितने पल झोली में हैं,
उतने दीप जलाओ |

महको, चमको और सबको जीवन का अमृत पान कराओ !

Saturday, July 20, 2019

अनजान रिश्ते

अपने ही शहर में कुछ यूँ फिरता हूँ
अपनी ही गली में हर शख्स से यूँ मिलता हूँ
रोज़ दिखते हों जो, पर सामने आते नहीं
पास से गुज़र जाते हैं पर मुस्कुराते नहीं
उनकी गहरी सांस की आवाज़ तक आती है मुझ तक,
पर बतियाते नहीं,
किनारों से मिलकर पानी के धारे जैसे
छू तो लेते हैं पर अपनाते नहीं
लगते हैं अपने ही हैं, एक ही देहलीज़ से निकले हुए
उन रिश्तों से बंधे जो, पिछले जन्मों से हैं
जो मौजूद हैं सदियों से
पर इस हस्ती में, नज़र आते नहीं।


Tuesday, April 09, 2019

कुछ ख्वाब देख लिए जाएं

रेखते के उसूल नहीं मालूम, 
पर कुछ हर्फ़ तो लिख दिए जाएं
हम कौनसे रहेंगे यहां हर वक्त मौजूद,
कुछ दर्द दे दिए जाएं कुछ सह लिए जाएं

रिवायतों से बंधे, कुछ गुच्छे खोल दिए जाएं
सदियों से भरे अंधियारों के प्याले उड़ेल दिए जाएं
वो कह गए कि हर प्रश्न का उत्तर नहीं है
पर ज़हन में जो हैं प्रश्न, पटल पर रख दिए जाएं

और कुछ हो न हो, ख्वाबों की अमीरी तो है
शराब हो हम पियें नहीं, ये ज़मीरी ही तो है
खुलते सूरज में, अध खुली आँखों से ही सही,
कुछ ख्वाब देख लिए जाएं, कुछ ख्वाब बांट दिए जाएं।

जो रम्ज़  है दिल में, भुला दिए जाएं
जो तूफान है अंदर, लुटा दिए जाएं
किनारे छोड़ दिये जाएं
प्याले तोड़ दिए जाएं
जो दिन मय्यसर हैं महफ़िल के
फिलहाल, जी लिए जाएँ।

Friday, March 22, 2019

कितनी कहानियाँ

हर दिन यूँ  हज़ारों ज़िन्दगी जीता जा रहा हूँ मैं
बिना लिखी कितनी  कहानियाँ  कहता जा रहा हूँ मैं।

जो राह अंदर से बनी थी, वो तो सुनहरी और घनी थी
बच्चों की फुलवारी सी, वो सपनों से सजी थी
कुछ रस्ते महकते थे कुछ पगडंडियां चमकती थीं
उन पगडंडियों में मचल कर, बहकता जा रहा हूँ मैं।

हाँ ये सच है कि चलते चलते कुछ डर गया था
हर खिड़की पे रखे मुखोटों से सहम गया था
अनजाने शहर की छिपकली सी गलियों में
कभी फिसलता कभी संभालता जा रहा हूँ मैं।


रस्ते सबके वही थे, हज़ारों आये चले गए
अफ़साने हर कदम बने, सबके बने, सब नए
कुछ ने पोथे भर दिए, कुछ रो दिए, हँस दिए
मैं क्या करूँ ये समझ नहीं पा रहा हूँ मैं।

गिर तो गया था पर यहाँ वहां टकरा कर
कभी पत्थर की लगी, कभी मैं लगा पत्थर से
पसलियों पर लगी, पर तेरी डोर सी एक बची रही
उसी डोर को अब दनादन, खींचे जा रहा हूँ मैं।

हर दिन यूँ  हज़ारों ज़िन्दगी जीता जा रहा हूँ मैं
बिना लिखी कितनी कहानियाँ  कहता जा रहा हूँ मैं।
















Monday, January 21, 2019

वो जो मंगल पर रहता है

वो जो मंगल पर रहता है
एक पत्थर 
जो यूँही पड़ा रहता है 
सदियों सदियों तक 

जिसका वजूद तो है 
पर किसे ख़बर 
न कोई रहबर 
न तूफ़ान का डर 
न ईमान की चिंता 
न कोई इलज़ाम, न सफाई 
न उठना, न बैठना 
न जीना, न मरना
न कोई प्रश्न कि मैं कौन हूँ 
कहाँ से आया हूँ, क्या करूँ, क्या न करूँ 
बस एक ही गुण, पड़े रहना 
या यूँ कहो, 'रहना' | 


जो धरती से एक चमकता तारा है 
जो धड़कते दिलों के लिए एक अद्भुत नज़ारा है 
जो है, और साबित है 
ज़र्रों से बना, खुद एक ज़र्रा है 
जो कलाकार है और श्रोता भी 
कृषक है, और उपभोक्ता भी 
जहाँ सब संचित है, और सब वंचित भी 

वहाँ ... 
क्यों कोई आये गुमराह हो कर 
और मेहमान बने इस बियाबान का 
क्यों कोई पासबाँ बन कर पहरा दे 
इस अनोखे शमसान का

वहाँ ... 
एक पत्थर 
जो यूँही पड़ा रहता है 
सदियों सदियों तक !











Tuesday, December 05, 2017


Now Madhurimayan (Hindi poems) is available as a printed book on Amazon.com and Amazon.in



Tuesday, August 22, 2017

जब ज़िन्दगी खुद सीने से लगा लेती है

जब ज़िन्दगी खुद सीने से लगा लेती है
थकते मुसाफिर को, पंख लगा देती है
जिसको हर कदम पर मिलती हो ज़िल्लतें
उसको मनचाही राहों का मेहमान बना देती है।

कोशिशें लाख होती हैं, तमन्नाएं लाख पलती हैं
पर मुकम्मल होना दूर, हर एक सांस जलती हैं
जब अपने मुँह छुपाते हैं, पराये दिशा भटकाते हैं
जब सुबह सूरज के दर्शन से, सिर्फ आहें निकलतीं हैं|

जब दिन भर के परिश्रम का,
सारांश सिर्फ इतना होता हैं,
शरीर थकता हैं, पल पल गिरता हैं
मन बस प्र्श्न उठाता है, रातों से डराता है|

जब कई साल यूँही बीत जाते हैं
निराशाओं के अँधेरे, लगभग जीत जाते हैं
तब कहीं तो अंतरतम, के पहचाने से एक कोने से,
आशा की एक चिंगारी सुलगती है,
हवा कुछ भी नहीं होती, पर न जाने क्यों भभकती है |

इंसान नहीं बदलता है, न सामान बदलते हैं,
बदलतीं सिर्फ हवाएं हैं,  जनम भर की दुआएं हैं
तब एक कदम इंसान का, एक धरती चलाता हैं
नए पंखों की ताकत से, कई और को उठाता है|

ये एक अजब किमया है,
एक  ज़रूरी जज़बा है
जो हर इंसान को हासिल है,
और हर सांस में शामिल है!!
























Tuesday, November 29, 2016

ज़िन्दगी चलती गयी

जब साथ चलने की बात हुई
कुछ कही कुछ अनकही भी साथ हुई 
जितना क्षण में भर सकते थे
जितना मन में रख सकते थे,
उतना सब तो तोल दिया  
जितना अग्नि से सांझा था 
जितना रिश्तों  ने बाँधा था 
उनसे ऊपर भी बोल दिया !

धागे, तब तो सिर्फ धागे थे 
हम तो सपनों के भी आगे थे
कभी दौड़ पड़े, कभी हम-कदम रहे 
कभी ठिठक गए कभी सिसक गए 
कभी चमक गए, कभी बहक गए
ज़िन्दगी, ज़िंदगी थी , चलती गयी 
गरजती, पसरती, संभलती गयी  
कुछ मैं बदलता गया  
कुछ तुम बदलती गयी।

कभी सोचा तुमसे बात करूँ
आज करूँ कल रात करूँ. 
अब एक कहानी नयी बुनूँ 
या पुरानी ख़त्म करूँ । 
मन पर एक अनजान पहरा सा था 
या ये समय का साँचा गहरा था 
किस्से किस्से रहे, हकीकत, हम रहे
मौसम तो मौसम थे , 
कभी खुश्क, कभी नम रहे!

ज़िन्दगी सिर्फ बदन नहीं थी, की पिघल जाती
या ख्वाब और फिक्र नहीं, की बहल जाती
उसके अपने रास्ते थे और अपनी मंज़िले
हम तो मुसाफिर थे, चलते गए
दूरियां, नज़दीकियां जगह बदलती गयीं
कुछ मैं ढलता गया, कुछ तुम ढलती गयी। 
















Wednesday, May 28, 2014

SARWAR MEMORIES!!

बड़ी हवेली और बड़ी सी चौखट
रास्ते घुमावदार और बड़े तख़्त वाली बैठक
अंदर कदम रखते ही कुछ ठण्ड सी महसूस होती थी।
पुरानी हवेली की वो पुरानी वाली खुशबू जो सिर्फ वहीँ मिला करती थी ।
दीवारों का प्लास्टर पथरीला सा था,
गावं के उन रास्तों  की तरह, जो हवेली से गुजरा करते थे।
उन ऊँची दीवारों में झांकते रोशनदान
जैसे मेरा ही रास्ता तकते थे ।

कच्चे आँगन वाला  गोबर और मिटटी से लीपा वो चौक,
गहन गर्मियों की तेज धूप भी थोड़ी सुस्ता लेती थी
उस सन्नाटे में,
जो सिर्फ टूटता था, ऊपरी मंज़िल पर तेज़ी से दौड़ते बच्चे की पदचाप से,
या फिर मेहमानों के आने से हुए कोलाहल से,
और ये लो! हो गई मनुहार की शुरुआत!

हम बच्चे हर वर्ष, हवेली के अगिनत कोनों को सँभालते
उनमे रखी नयी, पुरानी और पौराणिक वस्तुओं को खंगालते
कुछ यादों से भरी, कुछ मिटटी से सनी,
कुछ डरावनी सी, कुछ सिर्फ सुनी सुनी।

कभी उन कमरों में झांकते, जहाँ कोई नहीं जाता
और सुनते की वहां एक खज़ाना हैं, जिस पर नाग देवता का पहर है,
कभी वो पुरानी गिल्ली ढूँढ़ते, जो मैंने ही बबूल की लकड़ी से बनाई थी,
उसके छीले हुए सिरों को देख कर
सब याद आ जाता था, की कुल्हाड़ी मैंने कैसे कैसे चलाई थी।

कभी पूजा कक्ष में पूजा से ज़्यादा वह रखी तलवार को देखते
छुपे छुपाए उसे म्यान से निकाल कर उसकी धार मापते
जंग लगी तलवार को समझते शायद ये खून के धब्बे हों
और थोड़ा सारा युद्ध का माहोल सामने होता।

या फिर उसी पूजा कक्ष में गोंद के लड्डूओं की महक
 पूजा के बीच भी मन ललचाती थी,
"है भगवान माफ़ करना, बच्चा हूँ" ये समझ शायद, थोड़ा थोड़ा करके
पूरा डब्बा साफ़ करवा जाती थी ।

कभी सामने नीम के पेड़ की ऊँगली जैसी डाल पर
झूला डालने की होड़,
या उसकी छावं में चादर बिछा कर, पिकनिक की जोड़तोड़

ये सब सच था, स्वप्न नहीं था,
न था तो सिर्फ ये गुमाँ , की ये सब हमेशा के लिए नहीं है
नाना-नानी नहीं हैं, पर हवेली तो वही  है
गावं में रस्ते पक्के हो गए पर दीवारें और रोशन दान तो वही  है
पर न अब वो शरारतें हैं, न छुपे ख़ज़ाने को कोई खंगालने वाला
सिर्फ यादें हैं जो अक्सर सपनों में
सच को रमा देती हैं,
कभी बहला देती हैं तो
कभी बीच रात में दहला देती हैं
मेरे अंदर छुपे उस बचपन को
फिर से हवेली में दौड़ा  देती है!!


Saturday, March 29, 2014

मन के मन में!

मन की दुनिया, मन के दरिया,
मन की नाव और मन के चप्पू
साहिल सुदूर जो दिखे चमकते
कभी दिखे कभी ओझिल हो जाएँ
कभी बहकते, कभी सहमते
किसी पक्षी से आस लगाएं
पल में डरें और पल में छलांग लगाएं
मन के प्राणी, मन के मन में
मण मण के आकार बनायें
किसी को कहें कभी , कभी यूँ ही
खुद से बतियाते हुए पसर जाएँ
सब जब व्यस्त  है पृथ्वी  लीला में
मन ही क्यों मंगल पर जाए
क्यों पड़ा रहे करोड़ों सालों तक
एक सहमा सा अनजान अंतरिक्ष का पत्थर बन कर
या जमा रहे सेंकड़ों मीलों की बर्फीली परत बन कर
यहाँ सब कुछ तो है. शायद सब कुछ
फिर भी यूँ लगें की सूरज  तक तो जाऊं
बिना लाग लपट की, लपट बन जाऊं
अंदर  जलूं बाहर जलूं
जलूं इतना के बृह्मांड रोशन हो जाए
मैं जलूं यहाँ और वहाँ तहां जीवन सृजन हो जाये
कहाँ रात है और कहाँ है दिन
इस से मेरा क्या वास्ता !
कहाँ अपने हैं और कहाँ उनके बिन
इस से मेरा क्या वास्ता
मेरी लपट में जल जाएँ ब्रह्माण्ड भर के कपट
एक निर्मल आकाश रहे
मन के पखेरुओं के लम्बी उड़ान, निर्बाध रहे
इस धरती से उस धरती तक,
इस सौर मंडल से उस अंतरिक्ष तक,
इस जन्म से उन जन्मों तक
कभी बहकते कभी सहमते
मन के दुनिया में मन के प्राणी
चलें, बढ़ें और पार हो जाएँ!




 

Saturday, January 11, 2014

नयी सुबह



जो गुजर गया, कोहराम था,
जो बसर हुआ, तेरा  ही  नाम था,
यूँ हर तरफ थे रास्ते, कि हर तरफ थी मंज़िलें
बाहर उफनते जलजले और भीतर बियाबान था




जो मिले थे दो कदम, वो चले भी साथ दो कदम,
रह रह कर पूछते मुझे, आशियाँ की दास्ताँ,
दुश्मनो कि दास्ताँ, दोस्त की नादानियाँ
हर दो कदम था आशियाँ, हर दो कदम घमासान था




यूँ नहीं कि डर गया, और कुछ भी किया नहीं,
ये किया कि वो किया, और वो भी जो वजह नहीं,
हर कदम हयात से अड़ा, गफलतों का रहनुमां
कब का दिल निकल गया, सांस को पता नहीं




अरमान ही  थे अमानत , बमुश्किल आज़ाद रहे,
साहिल लगा की पास है,  पर  हर मौज़ हम नाशाद रहे,
मिले किसी से जो अगर, मिल कर के  हम यूँ हंस दिए
कुछ लम्हे ही सही, क्यूँ न दिल आबाद रहे!




अब तो सेहर है हो चली, उफक पे लाली लाल है,
कदम अभी तक हैं थके  हुए,पर बदली हुई सी चाल है,
नहीं कि जलजले थम गए, और बादल कभी न आयेंगे,
बस ये कि पयाम मिल गया, और सुलग गयी मशाल है.


ये लौ फिर से लाल है,  अँधेरे मिट ही जाएंगे
संग की  अब फिक्र किसे,  कभी पिघल ही जाएंगे
कोहरा हट ही जाएगा, रस्ते संवर ही जाएंगे,
तेरे नाम से ये हाल है , मिल कर क्या न कर जाएंगे !