Friday, December 11, 2020

Love and the lonely

"Capacity to love. It may look paradoxical to you, but it's not. It is an existential truth: only those people who are capable of being alone are capable of love, of sharing, of going into the deepest core of another person--without possessing the other, without becoming dependent on the other, without reducing the other to a thing, and without becoming addicted to the other. They allow the other absolute freedom, because they know that if the other leaves, they will be as happy as they are now. Their happiness cannot be taken by the other, because it is not given by the other."

Osho

Tuesday, November 24, 2020

बगावत

कुछ तो तिरे मौसम ही मुझे रास कम आये..
और कुछ मिरी मिट्टी में बग़ावत भी बहुत थी..
-परवीन शाकिर

Thursday, November 05, 2020

आग

तेरे खुशबू में बसे खत मैं जलाता कैसे
प्यार में डूबे हुए खत मैं जलाता कैसे
तेरे हाथों के लिखे खत मैं जलाता कैसे
तेरे खत मैं आज गंगा में बहा आया हूं
आग बहते हुए पानी में लगा आया हूं।

-राजेन्द्र नाथ रहबर #जन्मदिन

Thursday, January 02, 2020

रिश्तों का बाग़


एक फूल यहाँ खिलता है,
एक ख्वाब यहाँ पलता है,
जीवन के वन में धीरे धीरे
एक बाग़ नया बनता है। 

कितने आसमानों से हर शाम
परिंदे यहाँ उतर आते हैं,
कुछ अपने से हो कर, कुछ सहमे से,
इन्हीं शाखों पर चहचहाते हैं।

कुछ बतियाते, कुछ कहकहे लगाते हैं,
कुछ यूँ ही वहां दूर खड़े मुस्कुराते हैं,
और आहिस्ता आहिस्ता उनमें से कुछ
जीवन में उतरते जाते हैं।

रिश्ते कहाँ सिर्फ रिश्ते रहते हैं
हिमालय से रुके, तो कभी गंगा से बहते हैं।
रोज़ जिसे सजाया नहीं जाता,
वो एक जुड़ा हुआ इतिहास कहते हैं।

यूँ तो राहें कई निकलतीं हैं,
कुछ दूर तलक जाती,
कुछ काफिलों से संवरती,
तो कुछ अंधड़ों से निपटती हैं । 
कुछ नुक्कड़ पर सिमटती हैं
या गलियारों में मिल जाती हैं ।

बागों में फूलों की खुशबुएँ,
जब इन गलियारों से होकर ,
लम्बी राहों पर जाती हैं,
भेद नहीं करती हैं वो,
सब राहों को चुनती,
चूमती, झूमती गाती, और
जीवन के उल्लास से सराबोर
बिना शर्त, बिना शर्म,
वो सबको मिलाती, सुनती, बताती हैं।

इन्हीं राहों पे चलकर
इन्हीं गलियारों से मिलकर,
अपनों से मिलो और 
कुछ समय बिताओ,
कुछ पल के लिए रोको ये काफिला,
कुछ आनंद के गीत गाओ,

कुछ कहो अनजाना सा,
कुछ कही सुनी दोहराओ,
जितने पल झोली में हैं,
उतने दीप जलाओ |

महको, चमको और सबको जीवन का अमृत पान कराओ !

Saturday, July 20, 2019

अनजान रिश्ते

अपने ही शहर में कुछ यूँ फिरता हूँ
अपनी ही गली में हर शख्स से यूँ मिलता हूँ
रोज़ दिखते हों जो, पर सामने आते नहीं
पास से गुज़र जाते हैं पर मुस्कुराते नहीं
उनकी गहरी सांस की आवाज़ तक आती है मुझ तक,
पर बतियाते नहीं,
किनारों से मिलकर पानी के धारे जैसे
छू तो लेते हैं पर अपनाते नहीं
लगते हैं अपने ही हैं, एक ही देहलीज़ से निकले हुए
उन रिश्तों से बंधे जो, पिछले जन्मों से हैं
जो मौजूद हैं सदियों से
पर इस हस्ती में, नज़र आते नहीं।


Tuesday, April 09, 2019

कुछ ख्वाब देख लिए जाएं

रेखते के उसूल नहीं मालूम, 
पर कुछ हर्फ़ तो लिख दिए जाएं
हम कौनसे रहेंगे यहां हर वक्त मौजूद,
कुछ दर्द दे दिए जाएं कुछ सह लिए जाएं

रिवायतों से बंधे, कुछ गुच्छे खोल दिए जाएं
सदियों से भरे अंधियारों के प्याले उड़ेल दिए जाएं
वो कह गए कि हर प्रश्न का उत्तर नहीं है
पर ज़हन में जो हैं प्रश्न, पटल पर रख दिए जाएं

और कुछ हो न हो, ख्वाबों की अमीरी तो है
शराब हो हम पियें नहीं, ये ज़मीरी ही तो है
खुलते सूरज में, अध खुली आँखों से ही सही,
कुछ ख्वाब देख लिए जाएं, कुछ ख्वाब बांट दिए जाएं।

जो रम्ज़  है दिल में, भुला दिए जाएं
जो तूफान है अंदर, लुटा दिए जाएं
किनारे छोड़ दिये जाएं
प्याले तोड़ दिए जाएं
जो दिन मय्यसर हैं महफ़िल के
फिलहाल, जी लिए जाएँ।

Friday, March 22, 2019

कितनी कहानियाँ

हर दिन यूँ  हज़ारों ज़िन्दगी जीता जा रहा हूँ मैं
बिना लिखी कितनी  कहानियाँ  कहता जा रहा हूँ मैं।

जो राह अंदर से बनी थी, वो तो सुनहरी और घनी थी
बच्चों की फुलवारी सी, वो सपनों से सजी थी
कुछ रस्ते महकते थे कुछ पगडंडियां चमकती थीं
उन पगडंडियों में मचल कर, बहकता जा रहा हूँ मैं।

हाँ ये सच है कि चलते चलते कुछ डर गया था
हर खिड़की पे रखे मुखोटों से सहम गया था
अनजाने शहर की छिपकली सी गलियों में
कभी फिसलता कभी संभालता जा रहा हूँ मैं।


रस्ते सबके वही थे, हज़ारों आये चले गए
अफ़साने हर कदम बने, सबके बने, सब नए
कुछ ने पोथे भर दिए, कुछ रो दिए, हँस दिए
मैं क्या करूँ ये समझ नहीं पा रहा हूँ मैं।

गिर तो गया था पर यहाँ वहां टकरा कर
कभी पत्थर की लगी, कभी मैं लगा पत्थर से
पसलियों पर लगी, पर तेरी डोर सी एक बची रही
उसी डोर को अब दनादन, खींचे जा रहा हूँ मैं।

हर दिन यूँ  हज़ारों ज़िन्दगी जीता जा रहा हूँ मैं
बिना लिखी कितनी कहानियाँ  कहता जा रहा हूँ मैं।
















Monday, January 21, 2019

वो जो मंगल पर रहता है

वो जो मंगल पर रहता है
एक पत्थर 
जो यूँही पड़ा रहता है 
सदियों सदियों तक 

जिसका वजूद तो है 
पर किसे ख़बर 
न कोई रहबर 
न तूफ़ान का डर 
न ईमान की चिंता 
न कोई इलज़ाम, न सफाई 
न उठना, न बैठना 
न जीना, न मरना
न कोई प्रश्न कि मैं कौन हूँ 
कहाँ से आया हूँ, क्या करूँ, क्या न करूँ 
बस एक ही गुण, पड़े रहना 
या यूँ कहो, 'रहना' | 


जो धरती से एक चमकता तारा है 
जो धड़कते दिलों के लिए एक अद्भुत नज़ारा है 
जो है, और साबित है 
ज़र्रों से बना, खुद एक ज़र्रा है 
जो कलाकार है और श्रोता भी 
कृषक है, और उपभोक्ता भी 
जहाँ सब संचित है, और सब वंचित भी 

वहाँ ... 
क्यों कोई आये गुमराह हो कर 
और मेहमान बने इस बियाबान का 
क्यों कोई पासबाँ बन कर पहरा दे 
इस अनोखे शमसान का

वहाँ ... 
एक पत्थर 
जो यूँही पड़ा रहता है 
सदियों सदियों तक !











Tuesday, December 05, 2017


Now Madhurimayan (Hindi poems) is available as a printed book on Amazon.com and Amazon.in



Tuesday, August 22, 2017

जब ज़िन्दगी खुद सीने से लगा लेती है

जब ज़िन्दगी खुद सीने से लगा लेती है
थकते मुसाफिर को, पंख लगा देती है
जिसको हर कदम पर मिलती हो ज़िल्लतें
उसको मनचाही राहों का मेहमान बना देती है।

कोशिशें लाख होती हैं, तमन्नाएं लाख पलती हैं
पर मुकम्मल होना दूर, हर एक सांस जलती हैं
जब अपने मुँह छुपाते हैं, पराये दिशा भटकाते हैं
जब सुबह सूरज के दर्शन से, सिर्फ आहें निकलतीं हैं|

जब दिन भर के परिश्रम का,
सारांश सिर्फ इतना होता हैं,
शरीर थकता हैं, पल पल गिरता हैं
मन बस प्र्श्न उठाता है, रातों से डराता है|

जब कई साल यूँही बीत जाते हैं
निराशाओं के अँधेरे, लगभग जीत जाते हैं
तब कहीं तो अंतरतम, के पहचाने से एक कोने से,
आशा की एक चिंगारी सुलगती है,
हवा कुछ भी नहीं होती, पर न जाने क्यों भभकती है |

इंसान नहीं बदलता है, न सामान बदलते हैं,
बदलतीं सिर्फ हवाएं हैं,  जनम भर की दुआएं हैं
तब एक कदम इंसान का, एक धरती चलाता हैं
नए पंखों की ताकत से, कई और को उठाता है|

ये एक अजब किमया है,
एक  ज़रूरी जज़बा है
जो हर इंसान को हासिल है,
और हर सांस में शामिल है!!
























Tuesday, November 29, 2016

ज़िन्दगी चलती गयी

जब साथ चलने की बात हुई
कुछ कही कुछ अनकही भी साथ हुई 
जितना क्षण में भर सकते थे
जितना मन में रख सकते थे,
उतना सब तो तोल दिया  
जितना अग्नि से सांझा था 
जितना रिश्तों  ने बाँधा था 
उनसे ऊपर भी बोल दिया !

धागे, तब तो सिर्फ धागे थे 
हम तो सपनों के भी आगे थे
कभी दौड़ पड़े, कभी हम-कदम रहे 
कभी ठिठक गए कभी सिसक गए 
कभी चमक गए, कभी बहक गए
ज़िन्दगी, ज़िंदगी थी , चलती गयी 
गरजती, पसरती, संभलती गयी  
कुछ मैं बदलता गया  
कुछ तुम बदलती गयी।

कभी सोचा तुमसे बात करूँ
आज करूँ कल रात करूँ. 
अब एक कहानी नयी बुनूँ 
या पुरानी ख़त्म करूँ । 
मन पर एक अनजान पहरा सा था 
या ये समय का साँचा गहरा था 
किस्से किस्से रहे, हकीकत, हम रहे
मौसम तो मौसम थे , 
कभी खुश्क, कभी नम रहे!

ज़िन्दगी सिर्फ बदन नहीं थी, की पिघल जाती
या ख्वाब और फिक्र नहीं, की बहल जाती
उसके अपने रास्ते थे और अपनी मंज़िले
हम तो मुसाफिर थे, चलते गए
दूरियां, नज़दीकियां जगह बदलती गयीं
कुछ मैं ढलता गया, कुछ तुम ढलती गयी। 
















Wednesday, May 28, 2014

SARWAR MEMORIES!!

बड़ी हवेली और बड़ी सी चौखट
रास्ते घुमावदार और बड़े तख़्त वाली बैठक
अंदर कदम रखते ही कुछ ठण्ड सी महसूस होती थी।
पुरानी हवेली की वो पुरानी वाली खुशबू जो सिर्फ वहीँ मिला करती थी ।
दीवारों का प्लास्टर पथरीला सा था,
गावं के उन रास्तों  की तरह, जो हवेली से गुजरा करते थे।
उन ऊँची दीवारों में झांकते रोशनदान
जैसे मेरा ही रास्ता तकते थे ।

कच्चे आँगन वाला  गोबर और मिटटी से लीपा वो चौक,
गहन गर्मियों की तेज धूप भी थोड़ी सुस्ता लेती थी
उस सन्नाटे में,
जो सिर्फ टूटता था, ऊपरी मंज़िल पर तेज़ी से दौड़ते बच्चे की पदचाप से,
या फिर मेहमानों के आने से हुए कोलाहल से,
और ये लो! हो गई मनुहार की शुरुआत!

हम बच्चे हर वर्ष, हवेली के अगिनत कोनों को सँभालते
उनमे रखी नयी, पुरानी और पौराणिक वस्तुओं को खंगालते
कुछ यादों से भरी, कुछ मिटटी से सनी,
कुछ डरावनी सी, कुछ सिर्फ सुनी सुनी।

कभी उन कमरों में झांकते, जहाँ कोई नहीं जाता
और सुनते की वहां एक खज़ाना हैं, जिस पर नाग देवता का पहर है,
कभी वो पुरानी गिल्ली ढूँढ़ते, जो मैंने ही बबूल की लकड़ी से बनाई थी,
उसके छीले हुए सिरों को देख कर
सब याद आ जाता था, की कुल्हाड़ी मैंने कैसे कैसे चलाई थी।

कभी पूजा कक्ष में पूजा से ज़्यादा वह रखी तलवार को देखते
छुपे छुपाए उसे म्यान से निकाल कर उसकी धार मापते
जंग लगी तलवार को समझते शायद ये खून के धब्बे हों
और थोड़ा सारा युद्ध का माहोल सामने होता।

या फिर उसी पूजा कक्ष में गोंद के लड्डूओं की महक
 पूजा के बीच भी मन ललचाती थी,
"है भगवान माफ़ करना, बच्चा हूँ" ये समझ शायद, थोड़ा थोड़ा करके
पूरा डब्बा साफ़ करवा जाती थी ।

कभी सामने नीम के पेड़ की ऊँगली जैसी डाल पर
झूला डालने की होड़,
या उसकी छावं में चादर बिछा कर, पिकनिक की जोड़तोड़

ये सब सच था, स्वप्न नहीं था,
न था तो सिर्फ ये गुमाँ , की ये सब हमेशा के लिए नहीं है
नाना-नानी नहीं हैं, पर हवेली तो वही  है
गावं में रस्ते पक्के हो गए पर दीवारें और रोशन दान तो वही  है
पर न अब वो शरारतें हैं, न छुपे ख़ज़ाने को कोई खंगालने वाला
सिर्फ यादें हैं जो अक्सर सपनों में
सच को रमा देती हैं,
कभी बहला देती हैं तो
कभी बीच रात में दहला देती हैं
मेरे अंदर छुपे उस बचपन को
फिर से हवेली में दौड़ा  देती है!!


Saturday, March 29, 2014

मन के मन में!

मन की दुनिया, मन के दरिया,
मन की नाव और मन के चप्पू
साहिल सुदूर जो दिखे चमकते
कभी दिखे कभी ओझिल हो जाएँ
कभी बहकते, कभी सहमते
किसी पक्षी से आस लगाएं
पल में डरें और पल में छलांग लगाएं
मन के प्राणी, मन के मन में
मण मण के आकार बनायें
किसी को कहें कभी , कभी यूँ ही
खुद से बतियाते हुए पसर जाएँ
सब जब व्यस्त  है पृथ्वी  लीला में
मन ही क्यों मंगल पर जाए
क्यों पड़ा रहे करोड़ों सालों तक
एक सहमा सा अनजान अंतरिक्ष का पत्थर बन कर
या जमा रहे सेंकड़ों मीलों की बर्फीली परत बन कर
यहाँ सब कुछ तो है. शायद सब कुछ
फिर भी यूँ लगें की सूरज  तक तो जाऊं
बिना लाग लपट की, लपट बन जाऊं
अंदर  जलूं बाहर जलूं
जलूं इतना के बृह्मांड रोशन हो जाए
मैं जलूं यहाँ और वहाँ तहां जीवन सृजन हो जाये
कहाँ रात है और कहाँ है दिन
इस से मेरा क्या वास्ता !
कहाँ अपने हैं और कहाँ उनके बिन
इस से मेरा क्या वास्ता
मेरी लपट में जल जाएँ ब्रह्माण्ड भर के कपट
एक निर्मल आकाश रहे
मन के पखेरुओं के लम्बी उड़ान, निर्बाध रहे
इस धरती से उस धरती तक,
इस सौर मंडल से उस अंतरिक्ष तक,
इस जन्म से उन जन्मों तक
कभी बहकते कभी सहमते
मन के दुनिया में मन के प्राणी
चलें, बढ़ें और पार हो जाएँ!




 

Saturday, January 11, 2014

नयी सुबह



जो गुजर गया, कोहराम था,
जो बसर हुआ, तेरा  ही  नाम था,
यूँ हर तरफ थे रास्ते, कि हर तरफ थी मंज़िलें
बाहर उफनते जलजले और भीतर बियाबान था




जो मिले थे दो कदम, वो चले भी साथ दो कदम,
रह रह कर पूछते मुझे, आशियाँ की दास्ताँ,
दुश्मनो कि दास्ताँ, दोस्त की नादानियाँ
हर दो कदम था आशियाँ, हर दो कदम घमासान था




यूँ नहीं कि डर गया, और कुछ भी किया नहीं,
ये किया कि वो किया, और वो भी जो वजह नहीं,
हर कदम हयात से अड़ा, गफलतों का रहनुमां
कब का दिल निकल गया, सांस को पता नहीं




अरमान ही  थे अमानत , बमुश्किल आज़ाद रहे,
साहिल लगा की पास है,  पर  हर मौज़ हम नाशाद रहे,
मिले किसी से जो अगर, मिल कर के  हम यूँ हंस दिए
कुछ लम्हे ही सही, क्यूँ न दिल आबाद रहे!




अब तो सेहर है हो चली, उफक पे लाली लाल है,
कदम अभी तक हैं थके  हुए,पर बदली हुई सी चाल है,
नहीं कि जलजले थम गए, और बादल कभी न आयेंगे,
बस ये कि पयाम मिल गया, और सुलग गयी मशाल है.


ये लौ फिर से लाल है,  अँधेरे मिट ही जाएंगे
संग की  अब फिक्र किसे,  कभी पिघल ही जाएंगे
कोहरा हट ही जाएगा, रस्ते संवर ही जाएंगे,
तेरे नाम से ये हाल है , मिल कर क्या न कर जाएंगे !

























Wednesday, August 28, 2013

Translations of some favorite quotes


Because I came, blossoms opened
abundance is abroad, because I am.
At my ear, nightingale spellbinds my heart
I am father to all in the universe.
- Paul Klee

कलियों में निखार आया मुझसे ही
सुदूर बागों में बहार खिली मुझसे ही
नन्ही कोयल की आवाज़ ने  मुझे बाँध लिया
इस ब्रह्माण्ड को विस्तार मैंने   ही दिया ।
-पॉल क्ली
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I can Think, I can Wait and I can Fast.- Siddhartha, by Herman Hesse
सही सोच, कुछ सब्र और भूख से लड़ने की ताकत - इंसान को बहुत आगे ले जाती है!
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One should not cease from exploration
and the end of all our exploring
will be to arrive where we started
and know the place, for the first time- T.S. Eliot

बनकर  फक्कड़ खोजी हमको
दर दर घूमना होगा !
दम फूले या पैर थके हमें
शिखर चूमना होगा

लम्बी राह में कुछ यूँ भी होगा
जहाँ से निकले , वहीँ पहुँच गए
वही ज़मीं, वही आसमां  होगा
सिर्फ हम नए, और नजरिया नया होगा !

------------------
SLOW

Ease the pounding of my heart,
by quietening of my mind.
Help me to know,
the magical restoring power of sleep.
Slow me down, to look at a flower
To chat with an old friend
Or make a new one,
To pat a dog,
To watch a spider build a web
To smile at a child
or read from a good book.
Remind me each day,
that there is more to life, than increasing its speed.

ज़िन्दगी सिर्फ धडकनों का नाम नहीं है
ज़िन्दगी एक खुशनुमा राह है , मुकाम नहीं है!

गर चले दो कदम, दोस्त मिलेंगे,
कुछ गुम  हुई यादों से, कुछ नए बनेंगे
कहीं बच्चे मुस्कुराएँगे, कहीं फूल खिलखिलाएंगे,
कहीं यूँ ही पत्तियों से लटके जाल में उलझ जाएँगे
कहीं किताबों के पन्नों में कुछ पल सुस्ता लेंगे
तो कहीं मुंडेर पर बैठे पक्षी से बतिया लेंगे
तब कहीं ज़िन्दगी की गहराई हम तक
पहुंचेगी  धीरे से, और कहेगी,
 
ज़िन्दगी सिर्फ धडकनों का नाम नहीं है
ज़िन्दगी एक खुशनुमा राह है , मुकाम नहीं है!


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REMEMBER

So that you have a chance to be grateful

Childhood friends, beautiful places
grand mother's gift,
a favour by the road side,
a heart-some counsel
the cool breeze that touched
moments of insight
&
the one who created this beautiful world!


















 

Monday, July 29, 2013

What am I?

I am not the body
Not the mind either.
Not the subtle breath behind the existence
Not even the grand radiance within
Not the bellicose cosmos thrown around
What I am is a body standing on its feet.
Mind, resting on the living brain,
Breath, timed by the rhythms of destiny
now, near and right here,
sense of being without anchors
being central without the periphery
accessing the expanses without proximity
between the poles
between the gravitations fields
on the thin ridges of the universe,
sitting in the middle of waterless lakes of mars
where the rocks stay still for millions of years
without a guest without a host,
without a mast, without a post,
no name, no light,
restless but rested
living, but eternal
breathing but subtle
I am,
the shiny sparkle
of the little droplet of water
just about to give birth
to the beautiful tree
hidden inside the womb of a seed
hidden inside the womb of the earth
hidden inside the womb of the solar system
hidden inside the womb of the visible universe
hidden inside the womb of the invisible stretches of the universe
hidden inside the womb of existence
hidden inside the womb of non-existence
hidden inside the womb of the self.
now and near
visible and clear
A new construct
every moment
of what is
and what is not.


 

Monsoon Phir!!

हवा में नमी नमी रही ,
फिजां कुछ दबी दबी रही,
दिनों में दिन सिमट गए,
सहमे, रातों से लिपट गए।

जो नेकियों की सांस थी
कब तलक रहेगी साथ
जो तल्खियों की आग थी
वो धधक के कर रही थी बात

कदम कदम पे शोर था,
ज़ेहन ज़ेहन में शोर था,
गली अपनी थी शांत शांत
और हर मोड़ पे चोर था

इंसान सब बदल गए
अरमान भी बदल गए
जो जमीं पे रहे, रहे दफ़न
कि आसमान तक बदल गये.

एक हवा चली थी याद है,
एक शमा जली थी याद है,
कुछ खास नहीं, नहीं खास,
पर थी भली सी, याद है.

वो मिले भी तो भर झलक
बात  चली भी तो भर पलक
नूर नूर जेहन हुआ
नूर नूर जहाँ तलक

मन की सिमटी खुली थी  चादर
सुर्ख सा रेगिस्तान हुआ तरातर
लहेरों से लडती वजूद की कश्ती
साहिल बन गयी बीच समंदर।

सिर्फ मिलन नहीं था सब कुछ
कहीं तो रूहों का कलरव था,
बरसों भरते बादल दल का
मिलन तो  संघनन उत्सव था

अब वही नम शाम है
नाम जो था गुमनाम है
जिसके लिए था लहू जिगर
किस कदर सरे  आम है.

जो मिला, बरस गया,
जो रहा, वो तरस गया
सिलसिले यूँ हो गए
रूह रही पर रस गया !







 

Wednesday, May 15, 2013

बाँसुरी

बाँसुरी बजाना कहाँ आता है,
बस यूँ ही कुछ सुर निकल पड़ते हैं,
खेलते टहलते, अकेले चलते,
कभी अटकते, कभी सरल से।

सुबह आती है तो चहक लाती है
सांझ ढलती है  धरती महक जाती है
दिन भर का ताना बाना कुछ यूँ  बनता हैं
कि कदम उठते तो हैं
पर बहक पड़ते हैं, चलते चलते ।

लोग मिलते हैं, बातें चलतीं हैं,
बातें बनती  हैं, बनते न बनती हैं,
कभी पसरते, कभी सहमते,
कभी धीमे  से , कभी गरजते,
साँसें तो साँसें हैं, चलती रहती हैं,
दिन का  दरिया, मन की कश्ती
कहाँ रुके और कब  सुस्ताए
कब यूँ बांसुरी कोई बजाए
कुछ कहे, कुछ सिखाए
कुछ इस पल की, इस जन्म की
कुछ मंगल की, कुछ अनंत की,
कुछ ऐसा हो जाए, की सब खो जाए,
सब खो जाए या सब मिल जाए

पर…

बाँसुरी बजाना कहाँ आता है,
बस यूँ ही कुछ सुर निकल पड़ते हैं,
खेलते टहलते, अकेले चलते,
कभी अटकते, कभी सरल से।




 

Next dawn

Mornings bring the news
that life is all there.
Bird chirp and sun rises.
Bard picks up the harp and surmises,
what could be the new song
to be sung through the day;
ocean of words will now
rise and stay.

Between the muses, amidst the chores
amidst the torrents, rarely on shores,
bard must get up,
and attend to the call.
Mild, wavering, emanating from soul
there it is diminutive,
there it is a whole.

The walk in the alley,
of the well endowed,
right through the shanties
of the disavowed,
there are voices, calling for the feast.
angel of the yore,
tangled by the beast,
misled and distracted,
fallen and protracted,
they must endure,
the karmic churn they bore.
Word of the song,
would blossom into flowers,
hanging from the sky
right till the shore.
Ages pass, waiting for the bard.
everyone yearned,
no one really sang,
every one waited,
no bells rang.

It is time, it is time
bird are chirping, sun is on the rise
bard must rise and play the harp,
in the alley of voices sharp,
Some, it will soothe,
and calm their cycles,
of the timeless binds, in the cage-less jungles
freedom may be far
but worlds will calm
word will balm,
with little hope and a little warmth,
Bard must sing through the age of the alley
Now  on till the dusk,
right through the night and
till the next dawn..

Bard must sing,
right till the next bard.